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Sunday, 17 March 2013

सिर्फ तुझे ही पा लेने की ही थी ख्वाहिश

 
सिर्फ तुझे ही पा लेने की ही थी ख्वाहिश
है तुझेसे बिछड़ के मर जाने की ख्वाहिश

जानता हूँ फलक के चाँद पे भी कुछ दाग हैं
पर तू रहे बेदाग हमेशा, यही मेरी ख्वाहिश

परवाना हूँ पल भर मे जल  जाऊंगा, मगर
तू भी शबभर न जले सिर्फ अपनी ख्वाहिश 

लुटा दूं तुझपे अपनी सारी दौलत ऐ जहान
चला जाऊं फिर तेरी बज़्म से यही ख्वाहिश

पत्थर हूँ ज़र्रा ज़र्रा बिखर जाऊं रेत  बनकर
फिर लिपट जाऊं तेरे कदमो से मेरी ख्वाहिश

मुकेश इलाहाबादी ------------------------------

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