मुक्त केश संदल त्वचा, अधरों पे मुस्कान


मुक्त केश संदल त्वचा, अधरों पे मुस्कान
गोरी,वक्र भौंहे ऐसी  लगें जैसे तीर कमान
मुकेश इलाहाबादी ---------------------------

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

हरिवंश पुराण - तृतीय खंड — भाग 26 - द्वारका का विस्तार

हरिवंश पुराण - भाग ३० — बाणासुर :