होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Thursday, 23 January 2014

जिसकी खुमारी मे हम जी रहे हैं

जिसकी खुमारी मे हम जी रहे हैं
वो किसी और के जाम पी रहे हैं

अपने ही हाथो से कुरेद कुरेद कर
खुद ही अपने ज़ख्मों को सी रहे हैं

गो कि तमाम शहर जानता है हमें
नज़रों में हम उनके अजनबी रहे हैं

जिस्म के तमाम खरीदारों के बीच
हम जैसे मुहब्बत के सौदाई रहे हैं

लाखों और करोणों के मालिक तुम
मुकेश हम तो महज़ इकाई रहे हैं

मुकेश इलाहाबादी -------------------

No comments:

Post a Comment