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Wednesday, 5 February 2014

जलता हुआ लगे झुलसता हुआ लगे

जलता हुआ लगे झुलसता हुआ लगे
जाने क्यूँ ज़माना सुलगता हुआ लगे

न पीता हूँ और न ही मैखाने जाता हूँ
फिर भी ये ये दिल बहकता हुआ लगे

कोई गुल नहीं, कारखाना ऐ इत्र नहीं
फिर क्यूँ सब कुछ महकता हुआ लगे

हौले से तुमने जो मुझको छुआ जैसे
समंदर में सैलाब उमड़ता हुआ लगे

मुकेश हँसता भी है मुस्कुराता भी है
दिल ही दिल में सुबुकता हुआ लगे

मुकेश इलाहाबादी ------------------------

अलग से ---

यूँ तो बारिस में भीगी है सारी ज़मीं,,
फिर क्यूँ दिले शज़र सूखा हुआ लगे

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