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Sunday, 29 June 2014

रात, एक नदी है

रात,
एक नदी है
जिसमे अँधेरा बहता है
साझ होते ही
इस नदी में
मै डूब जाता हूँ
अपने ग़म और
खुशी के साथ
अपनी तन्हाई और
तुम्हारी यादों के साथ
और फिर
बहुत देर तक डूबा रहता हूँ
सुबह जब सूरज 
इस अंधेरी नदी को सोख लेता है
तब मै ताज़ादम हो जाता हूँ
एक बार फिर से
भागने के लिए
दौड़ने के लिए
ढेर सारा गम और
खुशी इकट्टा करने के लिए

मुकेश इलाहाबादी -------------

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