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Monday, 9 June 2014

दर्द की दास्ताँ हो गए

दर्द की दास्ताँ हो गए
गुज़रे हुए जहाँ हो गए

यंहा कोई नहीं रहता
टूटे हुए मकाँ हो गए

तेरा प्यार पा के हम
बड़े बदगुमाँ हो गए

कल तक सहरा थे
अब गुलिस्ताँ हो गए

तुम तो खफा थे,क्यूँ
आज मेहरबाँ हो गए

मुकेश इलाहाबादी ---

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