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Sunday, 6 July 2014

शहर में ऐसा कोई घर नहीं

शहर में ऐसा कोई घर नहीं
जंहाँ ग़म का बिस्तर नहीं

इन आखों में जो दरिया है
उससे बड़ा तो समंदर नहीं

जो कुछ भी हूँ मेहनत से हूँ
मुक़द्दर का मै सिकंदर नहीं

गरीब सही, मन का राजा हूँ 
किसी का मै का नौकर नहीं

टुकड़े - टुकड़े बिखर जाऊँगा
मुकेश मै कांच हूँ पत्थर नहीं 

मुकेश इलाहाबादी -----------