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Thursday, 31 December 2015

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए

बात अपनी हम बताने कहाँ जाए
ग़म अपना हम सुनाने कहाँ जाए
लोग  हाथों  में पत्थर लिए बैठे हैं
ऐसे में हम सर छुपाने कहाँ जाएँ
चोट पे नमक छिड़क देते हैं लोग
ऐसे में ज़ख्म दिखाने  कहाँ जाएँ
जाने किधर रूठ के तुम चले गए
बेगाने शहर में ढूंढने कहाँ जाएँ ?
तुम भी नहीं हो शहर में, ऐसे में
नया साल हम मनाने कहाँ जाएँ 
हर शख्श ग़मज़दा दिखता यहाँ
मुकेश बता मुस्कुराने कहाँ जाएँ 

मुकेश इलाहाबादी -----------------

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