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Friday, 1 April 2016

दर असल

दर असल
जब मैं,
तुम्हे डांट रहा होता हूँ
तुम्हारी मासूम शैतानियों पे
जैसे
कविता लिखते वक़्त
तुम्हारा मेरे कान में
आँचल के कोने को
मुरेड के हलके से गुदगुदा जाना

या फिर
जब कभी
किताब के पन्नो में मशगूल होने पे 
तुम्हारा मुँह चिढ़ा के
चाय या कॉफी बनाने चल देना

और मेरा कहना
'क्या बेवकूफी है ?'

सच -
तब वो मेरी नाराज़गी नहीं
इक मीठा सा गुस्सा होता है
तुम्हारे प्रति

मुकेश इलाहाबादी ----------- 

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