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Wednesday, 31 August 2016

जैसे किसी के ज़ेहन से यह बात उतर जाये

जैसे
ज़ेहन से
यह बात उतर जाये
कि उसने किताब के
पन्नो के बीच
गुलाब की एक कली
आहिस्ते से रखी थी कभी 
या कि 
किसी बहुत आत्मीय का
प्यारा सा ख़त अलमारी में
रखा था
बस ऐसे ही
तुम मुझे भूली नहीं हो
तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ

किसी दिन
अचानक किसी किताब को उलटते हुए
मुरझाए फूल सा मिलूंगा
या फिर ज़र्द पड़ गए खत सा
अलमारी में दबा मिलूँगा
तब तुम
फिर फिर मुझे याद करोगी
प्यार करोगी पूरी शिद्दत से

क्यूँ की तुम मुझे भूली नहीं हो
बस तुम्हारे ज़ेहन से उतर भर गया हूँ

(मेरी प्यारी सुमी)

मुकेश इलाहाबादी ---- 

बस
ऐसे ही तुम मुझे भूली नहीं हो



और यह बात
ज़ेहन से उतर जाए  भूल जाए
बहुत बहुत दिनों के लिए
या कि
किसी आत्मीय का
प्यारा सा ख़त
अलमारी में या किसी बक्से में
अख़बार के नीचे छुपा के
भूल जाए बहुत बहुत दिनों के लिए

बस ऐसे ही मैं
तुम्हारे ज़ेहन से उतर
भूल जाए
बहुत बहुत दिनों के लिए