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Thursday, 14 September 2017

कभी तुम्हारे बारे में सोचता हूँ

जब
कभी तुम्हारे बारे में सोचता हूँ
तो लगता है
तुम सिर्फ और सिर्फ मुहब्बत करने के लिए
बनी हो
मासूम सुआ पंखी सी आँखे
मूँगिया होंठ
अजीब कशिश भरा नमकीन चहेरा
जिससे सिर्फ
और सिर्फ मुह्हबत किया जा सकता है
बिना थके
बिना रुके
बिना ऊबे
अनंत काल तक
तब तक जब तक कि
दो जिस्म एक जान नहीं हो जाते
व्यष्टि समष्टि में समाहित नहीं हो जाते

सच ! सुमी तुम ऐसी ही हो
बिलकुल ऐसी ही

सच्ची - मुच्ची - तेरी कसम

मुकेश इलाहाबादी -----------

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