चाँद उगते ही चलने लगता हूँ मै भी

दर
रोज़ चाँद उगते ही
चलने लगता हूँ मै भी, उसके साथ - साथ

क़दम ताल करते हुए
चाँद के साथ साथ कभी धीरे तो कभी तेज़

पर चाँद - कभी इठला कर तो कभी मुस्कुरा कर
बादलों के पीछे छुप जाता है
किसी पहाड़ या ईमारत के पीछे
और मै तनहा रह जाता हूँ
जी रोने रोने को करता है
पर थोड़े ही देर में चाँद फिर मेरे साथ साथ चलने लगता है

पर चाँद कभी भी बगलगीर हो के नहीं चला मेरे साथ

बहुत बार ऐसा भी हुआ है
चाँदनी रातों में लेटा रहा छत पे तनहा
सोचता हुआ चाँद के बारे में
बतियाता रहा चाँद से , चाँद के ही बारे में
इस उम्मीद पे शायद किसी दिन
सितारों की तरह किसी दिन चाँद भी
टूट कर फलक से गिरे और मै उसे लोक लूँ अपनी बाँहों में
पर ! ऐसा भी नहीं हुआ कभी


बस यही इक अफ़सोस है

सुन रह हो न मेरे चाँद ??

मुकेश इलाहाबादी --------------

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