होम | रोज़नामचा | कविताएँ | कहानियाँ | विचार | ज्योतिष | लेखक

Sunday, 28 April 2019

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं

नम्र तो हैं पर मग़रूर बहुत हैं
लोग यहाँ के मशरूफ बहुत हैं

जिस्म तो पास पास हैं मगर
दिल इक दूसरे से दूर बहुत हैं

रूह पे गर्द की परत दर परत
चेहरे पे बनावटी नूर बहुत हैं

मुकेश इलाहाबादी -------------

No comments:

Post a Comment