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Friday, 22 September 2023

एकांत एक नदी है

 एकांत एक नदी है

जिसमे मै पड़ा रहना चाहता हूँ
किसी मगरमछ की तरह
या फिर बहता रहना चाहता हूँ,
चुपचाप, किसी टूटे पेड़ के तने
या लट्ठे जैसा
या फिर
बिन नाविक बिन पतवार की नाव सा
जिसमे लदे हैं
मेरे सारे दुःख सारे सुख
सारे भाव सारे विभाव
और वो नाव
जो सिर्फ हवा के बहाव से बहती हुई
हिंद महासागर सहित सातों समंदर से
होती हुई, पृथ्वी के किनारे पहुँच
गिर जाए अनंत के महा शून्य मे
जंहा मै सुन सकूँ
अपनी रगों का स्पंदन
और दिल की धड़कन
और, सुन सकूँ
तुम्हारी पुकार
जिसे तुमने कभी
उच्चारित ही नही किया मेरे लिये
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,
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धूप

 धूप

आवाज़ लगाकर, या
कुंडी खटखटाकर नही आती
धूप तो बस,
चुपचाप आसमान से उतर कर
बिछ जाती है, घर की छत पे
बाल्कनी मे,
बरामदों मे,
आंगन मे ओसारे मे
सड़कों और बाजारों मे
जिसकी रोशनी मे दुनिया निबटाती है
अपने सारे काम
यहि धूप शाम
चुपचाप खुद को लपेट कर चली जाती है
अपने गाँव,
छितिज के उस पार
और तब दुनिया सो जाती है
अंधेरे की चादर ओढ़ कर
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,,,,,,
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मै धूसर रँग

 मै धूसर रँग

जिसे समुन्द् सा हरा
आसमान सा आसमानी
धरती सा धानी बनाना चाहता हूंँ
हे प्रकृति तुम मुझे हजार हजार रँग दो
ताकि रंग बिरंगी चुनरी बन
ज़िंदगी के गले लग जाऊँ
मुकेश इलाहाबादी,,,,,,
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नदी किनारे

 नदी किनारे

बगल में बैठते ही
उसने,
पहले तो
अपने बांये हाथ की उँगलियों को
मेरे दाहिने हाथ की उँगलियों में उलझाया
काँधे पे सिर रखा
दूर सूरज को डूबते और
चाँद को उगते देखा
नदी की लहरों पे
दो फूलों को
एक दुसरे पे गिरते पड़ते बहते देखा
देर तक
फिर ऊब कर
काँधे से सिर उठा
अपने चिकने गालों को
शरारतन रगड़ा
"उफ़ ! तुम्हारे गाल कितने खुरदुरे हैं ??"
मैंने कहा
खुरदुरा पन ही तो है
जो अपनी जगह जमा रहने और खड़ा रहने में
सहायता करता है
वरना चिकनी सतह तो सिर्फ फिसलन देती है
ये खुरदुरा पन ही तो है जो
चिकनाई युक्त मैल को रगड़ रगड़ साफ़ करती है
मै आगे कुछ और कहता
इसके पहले उसने एक बार फिर
मेरे खुरदुरे गालों पे अपने चिकने गाल को रगड़ा
मुस्कुराई
काँधे पे सिर रखा
और देखने लगी
दो फूलों को जो एक दुसरे के ऊपर गिरते पड़ते
लहरों पे नाचते दूर जा रहे थे
मुकेश इलाहाबादी --------------------
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