जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम
रात की नर्म देहरी पर
जैस्मिन चुपचाप खिलती है,
सफेद पंखुड़ियों में
एक अनकहा उजाला लिए।
उसकी हर साँस में
कोई धीमा कंपन है
जैसे हवा ने
तुम्हारा नाम सीख लिया हो।
मैं पास से गुज़रता हूँ,
तो महक अचानक गहरी हो जाती है,
मानो स्मृति ने
फिर से दरवाज़ा खोला हो।
न तुम हो,
न तुम्हारी आहट
फिर भी यह सुगंध
मेरे चारों ओर
तुम्हारा एक अदृश्य घेरा खींच देती है।
जैस्मिन की साँस में
तुम्हारा नाम यूँ घुला है,
जैसे प्रेम कभी जाता नहीं
बस खुशबू बनकर
रात भर साथ रहता है।
मुकेश ,,,,,,
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