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Thursday, 26 February 2026

जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम

 जैस्मिन की साँस में तुम्हारा नाम


रात की नर्म देहरी पर

जैस्मिन चुपचाप खिलती है,

सफेद पंखुड़ियों में

एक अनकहा उजाला लिए।


उसकी हर साँस में

कोई धीमा कंपन है 

जैसे हवा ने

तुम्हारा नाम सीख लिया हो।


मैं पास से गुज़रता हूँ,

तो महक अचानक गहरी हो जाती है,

मानो स्मृति ने

फिर से दरवाज़ा खोला हो।


न तुम हो,

न तुम्हारी आहट 

फिर भी यह सुगंध

मेरे चारों ओर

तुम्हारा एक अदृश्य घेरा खींच देती है।


जैस्मिन की साँस में

तुम्हारा नाम यूँ घुला है,

जैसे प्रेम कभी जाता नहीं 

बस खुशबू बनकर

रात भर साथ रहता है।


मुकेश ,,,,,,

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