लफ़्ज़ों के बिना रिश्ता
हम बैठे थे, बिना कुछ कहे,
सिर्फ़ आँखों ने सब कुछ बताया।
हँसी भी छुपी हुई थी,
और चुप्पी में भी प्यार गूँजता था।
तुम्हारे हाथ की हल्की सी छू,
मेरा दिल समझ गया,
कभी शब्दों की जरूरत नहीं होती,
जब रूहें एक-दूसरे को जानती हैं।
सन्नाटा भी हमारा दोस्त बन गया,
हर धड़कन में हम एक हो गए,
और वो पल, वो मौन,
हमेशा के लिए यादों में बस गया।
लफ़्ज़ों के बिना रिश्ता बना,
जो ना टूटे, ना बिखरे,
सिर्फ़ एहसासों की नदी में
हमने अपना अस्तित्व पाया।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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