मैं सिगरेट था, वो अग्नि - दो
कभी-कभी प्रेम नशा नहीं होता,
बल्कि एक धीमी आत्मदाह होता है
जहाँ धुआँ भी कविता बन जाता है।
मैं राख था, वो अपने होंठों से फूँक देती थी
(एक अधूरी साँस, जो कभी पूरी कविता बन सकती थी)
मैं राख था।
किसी पुराने प्रेम की जली हुई परत,
जिसमें अब आग नहीं बची थी,
सिर्फ़ स्मृति थी
ठंडी, मगर चुभती हुई।
वो आती थी…
हर बार अपने होंठों से
मुझे हल्के से फूँक देती
जैसे कोई बीते समय को
दुबारा उड़ाना चाहता हो,
बिना छुए।
उसकी वो फूँक
कभी प्रेम नहीं थी,
न ही कोई पश्चाताप।
वो एक आदत थी
जो जल चुकी चीज़ों से भी/थोड़ा खेलना चाहती थी।
मैं उड़ता था…/कभी उसकी हथेलियों पर गिरता,
कभी उसकी ज़ुल्फ़ों में अटकता,
और कभी उसकी पलकों पर बैठ
उसकी आँखों में उतर जाता था।
उसे मेरी राख से डर नहीं था।
वो जानती थी
कि मैं अब उसे जला नहीं सकता।
पर मैं जानता था
वो अब भी जला सकती थी।
अपने होंठों से, अपनी बातों से,
या केवल एक फूँक से…
मुझे उड़ा सकती थी फिर से
किसी अधूरे मोह के भँवर में।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,
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