मामूली
मुझमें कुछ ख़ास नहीं है,
मैं एक बेहद मामूली इंसान हूँ।
न मेरी बातों में चमक है,
न चाल में कोई रोब।
भीड़ में खड़ा रहूँ
तो कोई अलग से नहीं पहचानता।
मैं वही हूँ
जो कतार में चुपचाप अपनी बारी का इंतज़ार करता है,
जो अपनी खुशियाँ धीरे से मनाता है
और दुख भी बिना शोर के सह लेता है।
मेरे पास न बड़े ख़्वाबों की फ़ेहरिस्त है,
न कामयाबियों के क़िस्से।
बस कुछ सादे-से दिन हैं,
और कुछ सच्ची-सी रातें।
हाँ, मैं मामूली हूँ
मगर दिल में जगह
बहुत गहरी रखता हूँ।
जिसे अपना कह दूँ
उसे यूँ ही नहीं छोड़ता।
मेरी मोहब्बत शोर नहीं करती,
मगर देर तक रहती है।
मैं फूलों की तरह
रोज़ नज़र नहीं आता,
शायद मिट्टी की तरह हूँ—
जो दिखती कम है,
मगर जड़ें उसी में सांस लेती हैं।
मुझमें कुछ ख़ास नहीं
सिवाय इसके
कि जो भी हूँ
पूरा हूँ।
और अगर कभी
तुम्हें किसी चमक-दमक से थकान हो,
तो याद रखना
एक मामूली-सा इंसान
अब भी यहीं है,
सादा,
सच्चा,
और तुम्हारे लिए मुकम्मल।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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