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Tuesday, 24 February 2026

खोजे जाने से पहले का देश

 खोजे जाने से पहले का देश


खोजे जाने से पहले

देश कैसा होता है?


क्या वह इंतज़ार करता है

किसी जहाज़ की आहट का?

क्या वह क्षितिज पर नज़रें गड़ाए

सोचता है—

“कब कोई मुझे ढूँढेगा?”


नहीं।


वह तब भी सांस लेता है

नदियाँ अपनी धुन में बहती हैं,

पहाड़ अपने मौन में अडिग रहते हैं,

जंगल अपनी भाषा में गाते हैं।


खोजे जाने से पहले का देश

किसी मानचित्र का रिक्त स्थान नहीं होता;

वह स्मृतियों से भरा हुआ होता है

लोकगीतों में,

अग्नि के चारों ओर बैठी कथाओं में,

धान की गंध में,

बारिश की पहली बूँद में।


किसी नाव के आने से पहले भी

तट थे।

किसी ध्वज के गाड़े जाने से पहले भी

धरती अपनी थी

उन लोगों की

जो उसे माँ कहते थे,

न कि संपत्ति।


खोज एक घोषणा है,

अस्तित्व नहीं।


जिस दिन किसी ने कहा

“यहाँ एक नया देश मिला,”

उस दिन भी

सूरज उसी तरह उगा था,

और बच्चों ने उसी मिट्टी में

अपने पाँव गाड़े थे।


खोजे जाने से पहले का देश

अज्ञात नहीं था;

बस किसी और की दृष्टि में

अनाम था।


नाम बदलते हैं,

पर नदियाँ अपना रास्ता नहीं भूलतीं।

सीमाएँ खिंचती हैं,

पर हवा पासपोर्ट नहीं माँगती।


खोजे जाने से पहले का देश

अपनी धड़कन में पूर्ण था

न किसी प्रमाण की ज़रूरत,

न किसी मुहर की।


और शायद

सबसे सच्चा देश वही होता है

जो किसी खोज का परिणाम नहीं,

बल्कि अपने होने की

स्वतंत्र घोषणा हो।


क्योंकि

जिसे खोजा गया कहा जाता है,

वह अक्सर पहले से

जीता-जागता, संपूर्ण,

और स्वयं में पर्याप्त होता है।


मुकेश ,,,,,,

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