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Sunday, 22 February 2026

सिगरेट की डिब्बी में छुपा उसका ख़त

 सिगरेट की डिब्बी में छुपा उसका ख़त


मैंने जब

पुरानी जैकेट की जेब टटोली 

तो एक सिगरेट की डिब्बी मिली,

बेसुध सी, थकी हुई,

जैसे बहुत कुछ देख आई हो

मेरे और उसके बीच।

डिब्बी में

अब सिगरेट नहीं थी 

बस

एक तह किया हुआ

पुराना, सूखा

नीले स्याही से लिखा ख़त था।

उसकी लिखावट

जैसे किसी धुएँ की लकीर हो 

बिखरी, सुलगी, फिर कहीं ग़ायब।

"तुम्हारे बिना धुआँ

जैसे ठंडा पड़ जाए,"

उसने लिखा था

"और तुम तो खाँसते भी नहीं अब

मुझे याद कर के।"

मैंने वह ख़त

सिगरेट की तरह होंठों से लगाया 

शब्द,

तंबाकू की जगह घुलने लगे भीतर,

और हर वाक्य

फेफड़ों में कोई भूली बिसरी सिसकी बन बैठा।

कभी सोचा न था 

कि मोहब्बत को

राख के डिब्बे में बंद कर

इतनी बेफिक्री से रख दूँगा

और भूल भी जाऊँगा।

पर अब जब

वो डिब्बी मिली,

उसका ख़त 

तो लगा,

वो आज भी वहीं है,

सिगरेट की डिब्बी में छुपी,

एक सुलगते हुए एहसास की तरह

जो बुझा नहीं 

बस चुप है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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