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Friday, 27 February 2026

नदी की आत्मकथा

 नदी की आत्मकथा (मुक्त छंद में)


मैं — एक नदी हूँ।

पहाड़ की गोद से जन्मी,

बर्फ़ की कोख से निकली,

पहली बार जब बहना शुरू किया,

तो लगा जैसे मैं कोई गीत हूँ —

जिसे स्वयं पृथ्वी गुनगुना रही हो।


मैं पत्थरों से टकराई,

कभी फूटी, कभी टूटी,

पर हर टकराव ने

मेरे संगीत को और गहरा किया।

मैंने सीखा —

रुकना मृत्यु है,

बहना ही जीवन।


पहाड़ों से उतरते हुए

मैंने देखा —

कैसे मनुष्य अपने छोटे-छोटे बाँधों से

मुझे रोकने की कोशिश करता है,

जैसे वह समय को बाँध सकता हो।

पर मैं जानती हूँ —

रोक ली गई नदी

या तो सूख जाती है,

या फट पड़ती है।


मैं खेतों को सींचती हूँ,

लोगों को जीवन देती हूँ,

पर जब वे मेरे जल में ज़हर घोलते हैं,

तो मेरी आँखें जल उठती हैं।

मैं फिर भी बहती रहती हूँ —

क्योंकि मेरा धर्म देना है,

लेना नहीं।


कभी मैं पवित्र गंगा कहलाती हूँ,

कभी नर्मदा, कभी ब्रह्मपुत्र,

कभी केवल एक नाली।

नाम बदलते हैं,

पर प्रवाह वही रहता है।

मैं वही हूँ —

जो बादलों में भाप बन जाती है,

और फिर बूंद बनकर लौट आती है।


मैंने सभ्यताएँ जन्मते देखी हैं —

घाटों पर हवन,

नावों में प्रेम,

किनारों पर वचन।

और देखा है,

कैसे लोग मरने से पहले

मुझमें घुल जाना चाहते हैं,

जैसे मैं मुक्ति का द्वार हूँ।


कभी मैं शांत बहती हूँ,

तो कोई मुझे “माँ” कहता है;

कभी उग्र हो उठती हूँ,

तो वही मुझे “आपदा” कहता है।

पर सत्य यह है —

मैं न माँ हूँ, न आपदा,

मैं केवल प्रवाह हूँ —

जो सृष्टि के श्वास की निरंतरता है।


रात के सन्नाटे में

जब चाँद मेरे जल पर उतरता है,

तो लगता है —

ब्रह्मांड मुझमें झाँक रहा है।

हर लहर में एक सवाल है,

हर बूंद में एक स्मृति।


मैं नदी हूँ —

धरा की नाड़ी,

जीवन का राग,

और मृत्यु का सेतु।

मेरा अंत समुद्र नहीं,

मेरा अंत तो बादल बनकर

फिर से जन्म लेना है।


मैं अनंत हूँ —

जैसे प्रेम,

जैसे आत्मा,

जैसे यात्रा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,,,,

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