मैं बिट्टो हूँ… और मेरी दुनिया ऐसी ही है
मैं बिट्टो,
आज भोर में ही उठ गई थी।
अम्मा कह रही थीं
आज घर के आगे की नाली साफ़ करनी है,
क्योंकि मोहल्ले वाले
हमेशा हमें ही बुलाते हैं—
ना जाने क्यों
सफाई भी जात पूछकर होती है।
अम्मा बोली
"जल्दी कर बिट्टो,
लोग आते ही होंगे काम देने।”
मुझे अच्छा नहीं लगता,
पर क्या करूँ
अम्मा के साथ जाना ही पड़ता है।
कभी-कभी सोचती हूँ
काश मैं भी
चुनिया की तरह
स्कूल की कॉपी में फूल बनाती,
या गुड्डू की तरह
मेले में चढ़–उतार वाली झूला झूलती।
पर मेरे हिस्से में
झाड़ू, नाली और बासन ही आए हैं।
छुटका आज फिर रो रहा है
कह रहा है भूख लगी है।
मैंने उसे चुप कराया,
अपने हिस्से की रोटी
उसके आगे सरका दी।
अम्मा बोली
"तू खा ले बिट्टो,
दिन भर काम करना है…"
पर मुझे पता है—
छुटका भूखा हो
तो अम्मा का दिल टूटता है।
पप्पू आज फिर रास्ते में मिला था।
धीरे से बोला,
"बिट्टो, तू हँस दिया कर…
अच्छी लगती है।”
और उसी आवाज़ में
कुछ ऐसा था
जिससे दिल काँप जाता है।
मैं जल्दी-जल्दी आगे बढ़ गई
कि कहीं मोहल्ले की औरतें
कुछ देख न लें।
शाम को जब सब सो जाते हैं
तो मैं अपनी टूटी दीवारों में
एक सपना टांग देती हूँ
कि एक दिन मैं भी पढ़ूँगी,
किताबें खोलूँगी,
कुछ लिखूँगी,
कुछ बनूँगी…
पर फिर याद आता है
अम्मा और छुटका
मेरे बिना कैसे चलेंगे?
चलो, अब जाना पड़ेगा
नाली का पानी
तेज़ धूप में बदबू मारने लगता है।
अम्मा पुकार रही हैं…
और बिट्टो
फिर से बिट्टो लौट आती है।
मुकेश ,,,,,,
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