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Tuesday, 24 February 2026

लहरों की गवाही में इतिहास

 लहरों की गवाही में इतिहास


इतिहास अक्सर

स्याही से लिखा जाता है

राजाओं के नाम,

युद्धों की तिथियाँ,

खोजों की घोषणाएँ।


पर समुद्र

काग़ज़ पर हस्ताक्षर नहीं करता।

वह लहरों में बोलता है।


जब पहली नाव

किसी अनजान तट पर लगी,

तो इतिहास ने कहा

“यह आरंभ है।”

पर लहरें हँसीं

“आरंभ?

हम तो सदियों से

इन रेतों को छूती आ रही हैं।”


लहरों की गवाही में

कोई विजेता नहीं होता,

सिर्फ़ आगमन और प्रस्थान होते हैं।


वे जानती हैं

कितनी नावें आईं,

कितने ध्वज गड़े,

कितने नाम बदले।

पर हर ज्वार के साथ

वे रेखाएँ धुल जाती हैं।


इतिहास कहता है

“यह भूमि खोजी गई।”

लहरें कहती हैं

“यह भूमि हमेशा थी।”


उनकी स्मृति में

न कोई सीमाएँ हैं,

न कोई साम्राज्य।

सिर्फ़ नमक है

जो हर आँसू और हर पसीने में

समान स्वाद रखता है।


रात के सन्नाटे में

अगर तट पर बैठो,

तो सुनोगे

लहरें सिर्फ़ पानी नहीं लातीं,

वे कथाएँ लाती हैं।


उन कथाओं में

मछुआरों की थकी हुई साँस है,

यात्रियों की बेचैन दृष्टि,

और उन लोगों की खामोश पीड़ा

जिनके नाम

इतिहास की किताबों में नहीं हैं।


लहरों की गवाही में

इतिहास स्थिर नहीं;

वह गतिमान है

जैसे समुद्र का हृदय।


वे हर बार लौटती हैं,

पर हर बार नई होती हैं।

और शायद

यही सच्ची गवाही है

कि कोई कथा अंतिम नहीं,

कोई दावा शाश्वत नहीं।


जब स्याही मिट जाएगी,

और पन्ने पीले पड़ जाएँगे,

तब भी समुद्र रहेगा

अपनी अनवरत आवाज़ में

कहता हुआ


“मैंने सब देखा है,

पर मैं किसी का नहीं।

मैं सिर्फ़ समय का साक्षी हूँ।”


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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