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Sunday, 22 February 2026

धुएँ के छल्लों में वो

 धुएँ के छल्लों में वो


अक्सर वो कहती —

"छल्ले बनाओ धुएँ से…"

और मैं

कश दर कश

धुएँ को हवा में तराशता

वो उन गोल गोल धागों को

टकटकी लगाए देखती रहती

जैसे कोई ऋषि

ध्यानमग्न हो

अग्नि की लपटों में भविष्य पढ़ रहा हो

कभी उसके चेहरे पे

मुस्कुराहट की महीन दरार

और कभी आँखों में

किसी बुझती हुई बात की नमी

शायद…

वो देख रही होती थी

खुद का जलना

मेरी सिगरेट में

धीरे-धीरे

एक सिरे से राख में ढल जाना

या फिर

उसके भीतर की कोई

अधूरी कविता

उस धुएँ के छल्लों में

पूरा रूप ले रही होती

कभी-कभी

वो अचानक कहती—

मुकेश ,,,,,,,,,,,,


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