“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
जब उसने
मेरे होठों से
सुलगती सिगरेट छीन के
फेंक दी
और सिगरेट की जगह
ख़ुद
होंठों से लग गई,
फिर…
हम दोनों
देर तक
सुलगते रहे
बिना धुएँ के,
बिना आवाज़ के।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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