एक जंगल मायावी दरख़्तों का
एक जंगल है
मायावी दरख़्तों का,
जहाँ पत्ते हवा से नहीं,
विचारों से हिलते हैं।
उस जंगल में
रास्ते मिट्टी के नहीं,
स्मृतियों के बने हैं।
जिस ओर कदम बढ़ाओ,
कोई पुरानी कहानी
जड़ों से सिर उठाने लगती है।
दरख़्तों की छाल पर
अदृश्य लिपि खुदी है
अनुभवों की,
वासनाओं की,
और उन इच्छाओं की
जो कभी पूरी न हो सकीं।
जब तुम भीतर जाते हो,
जंगल तुम्हें पहचान लेता है।
एक दरख़्त
तुम्हारे बचपन की आवाज़ बन जाता है,
दूसरा
किसी अधूरे प्रेम की छाया।
यहाँ चिड़ियाँ
भविष्य की फुसफुसाहट गाती हैं,
और हवा
बीते जन्मों की गंध लाती है।
कभी अचानक
कोई पेड़ आकार बदल लेता है
डर का चेहरा बनकर,
या मोह का जाल बुनकर।
और तुम समझते हो
यह जंगल बाहर नहीं,
भीतर उगा हुआ है।
मगर इसी मायावी वन के बीच
एक निर्मल सरोवर भी है
शांत, अचल।
जो उसकी सतह पर झुक जाए,
उसे अपना असली चेहरा दिखता है।
तभी ज्ञात होता है
दरख़्त मायावी हैं,
पर जंगल सत्य है।
भ्रम शाखाओं पर है,
जड़ें तो एक ही हैं।
जो इस वन से गुज़र जाता है,
वह लौटकर
वैसा नहीं रहता।
उसकी आँखों में
थोड़ी-सी धूप उतर आती है,
और वह जान लेता है
माया डर नहीं,
दीक्षा है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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