मैं, मोहब्बत और एक तन्हा रात
मैं हरी फसल नहीं था,
बस उस ज़मीन की तरह था
जिस पर किसी ने वक़्त ही नहीं दिया
बस उम्मीदें बोईं और छोड़ दिया...
मैं ख्वाब नहीं देखता था,
ख्वाब खुद मेरी आंखों में उतर आते थे
और तुम...
हर ख्वाब में वही थी
जैसे रौशनी में लिपटी एक छलावा
साया भी तेरा, धोखा भी।
जब सड़कें पार करता था
तू ज़िंदगी की मीठी बातें करती थी
मैं तुझे सुनता था
तेरी आँखों में कोई घर ढूंढता था
तू आगे देखती थी
मैं सिर्फ़ तुझे देखता रहा।
उम्र के इस तीसरे पड़ाव में आकर
ना कोई दरवाज़ा खुला मिलता है
ना कोई आवाज़ पुकारती है नाम लेकर,
अब सब कुछ शोर सा लगता है
भीतर का, बाहर का,
एक बेहिसाब तन्हाई का कोलाहल।
तू मुझे चादर ओढ़ा कर
किसी और ख्वाब में चली गई
और मैं?
मैं उसी चादर को आँखों तक खींचे
तेरी गैरमौजूदगी की ठंड से काँपता रहा।
अब मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता
अब तो रौशनी से डर लगता है
कहीं फिर तू ना दिख जाए
एक और मुस्कान के पीछे छुपी बेवफाई बनकर।
अब मोहब्बत नहीं करता
किसी से भी नहीं
क्योंकि अब भरोसा नहीं
किसी आवाज़ पर, किसी हाथ पर
किसी कसम पर...
मैं अब मिट्टी भी नहीं
मैं अब राख हूँ
जिसमें कोई फूल नहीं उगता
बस कुछ जले हुए लफ़्ज़
जो हर रात तेरे नाम से जलते हैं...
मुकेश ,,,,,,,,,,
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