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Monday, 23 February 2026

अधूरी बात का सिरा

 अधूरी बात का सिरा 


अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,

जैसे कोई धागा आधा रह गया।


कहीं बीच में रुक गई हँसी,

कहीं अधूरा रह गया कोई फुसफुसा सा किस्सा।


मैंने पूछा, “क्यों छोड़ा?”

पर हवा ने भी जवाब नहीं दिया।


हर याद में उसकी परछाई मिली,

हर लम्हे में अधूरापन समाया।


वो चली गई,

और मेरे सवाल

सिर्फ़ खामोशी में गूँजते रहे।


अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,

और मैं उसे पकड़ कर

हर दिन वही पूरा करने की कोशिश करता रहा।


मुकेश ,,,,,,,,,,,

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