अधूरी बात का सिरा
अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,
जैसे कोई धागा आधा रह गया।
कहीं बीच में रुक गई हँसी,
कहीं अधूरा रह गया कोई फुसफुसा सा किस्सा।
मैंने पूछा, “क्यों छोड़ा?”
पर हवा ने भी जवाब नहीं दिया।
हर याद में उसकी परछाई मिली,
हर लम्हे में अधूरापन समाया।
वो चली गई,
और मेरे सवाल
सिर्फ़ खामोशी में गूँजते रहे।
अधूरी बात का सिरा हाथ में रह गया,
और मैं उसे पकड़ कर
हर दिन वही पूरा करने की कोशिश करता रहा।
मुकेश ,,,,,,,,,,,
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