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Tuesday, 24 February 2026

उसके नाम के बिना

 उसके नाम के बिना


बहुत बरस नहीं हुए,

बस एक मौसम पहले की बात है

जब मेरी दुनिया में

एक नीली-सी रोशनी उतरी थी।


मैं उसका नाम

काग़ज़ पर नहीं लिख पाऊँगा,

स्याही काँप जाएगी,

लफ़्ज़ ठिठक जाएँगे

पर वह समझ जाएगी

कि यह उसी के लिए है।


वह ऐसे आती थी

जैसे शाम की पहली ठंडी हवा

थके हुए दिन को छू ले;

जैसे किसी पुराने राग में

अचानक एक सच्चा सुर लग जाए।


हमने कभी कहा नहीं

“हम एक-दूसरे के हैं।”

पर हमारी चुप्पियाँ

एक-दूसरे की भाषा जानती थीं।

भीड़ में भी

हमारी नज़रें

एक ही रास्ता चुन लेती थीं।


लोग कहते हैं

समय सब बहा ले जाता है।

पर समय क्या जाने

उन पलों का वज़न

जो दिल की तहों में

पत्थर की लकीर बन जाते हैं।


एक दिन

हवा ने रुख बदल लिया,

और हालात की ठंड

हमारे दरमियान आ बसी।

वह चली गई—

जैसे लहर किनारे से लौट जाती है,

पर अपने निशान

रेत में छोड़ जाती है।


अब भी जब चाँद

कुछ ज़्यादा सफ़ेद लगता है,

जब रात थोड़ी ज़्यादा गहरी हो जाती है,

तो मुझे लगता है

वह यहीं कहीं है।


मैं उसका नाम

ज़ोर से नहीं पुकारता,

पर हर धड़कन में

एक अनसुना संबोधन है।


न ऊपर का आसमान,

न नीचे की ज़मीन,

न दूरियाँ, न चुप्पियाँ

कुछ भी अलग नहीं कर पाया

उस एहसास को

जो बिना नाम के भी

पूरा है।


कभी-कभी

मैं अपने भीतर के समुद्र किनारे जाता हूँ,

जहाँ लहरें

कोई अक्षर नहीं लिखतीं

सिर्फ़ एक आहट छोड़ जाती हैं।


और वह,

अगर यह पढ़ेगी

तो मुस्कुराकर कहेगी,

“नाम नहीं लिखा,

फिर भी सब कह दिया।”


क्योंकि कुछ प्रेम

काग़ज़ पर नहीं,

पहचान में लिखे जाते हैं।


और उसे

अपनी पहचान

मुझसे पूछने की ज़रूरत नहीं।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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