मैं, जुदाई और सन्नाटा
मैं बैठा हूँ उस कमरे में,
जहाँ हर कोना तेरी कमी की गवाही देता है।
सन्नाटा मेरे चारों ओर बिखरा है,
जैसे कोई पुराने गीत को भूल गया हो।
जुदाई की हवा हर खिड़की से टकराती है,
और मेरे दिल की खामोशी में
तेरे नाम की गूँज उठती है।
हर धड़कन पूछती है
क्यों हम अलग हुए,
और क्यों हमारी कहानी अधूरी रह गई।
मैंने तेरे चेहरे को अपनी यादों में उतारा है,
हर मुस्कान, हर आहट, हर ख्वाब।
लेकिन अब वो सब
सिर्फ सन्नाटे के बीच बोलते हैं,
और मैं सुनता हूँ,
बस सुनता हूँ,
बिना शब्दों के, बिना जवाब के।
जुदाई ने मेरी तन्हाई को सजाया है,
सन्नाटा मेरे गीतों में घुल गया है।
मैं अपने आँसुओं को रोकता हूँ,
पर हर छींटा तेरी याद की बारिश बन जाता है,
और मुझे भीगने को मजबूर कर देता है।
फिर भी, मैं बैठा हूँ,
इस सन्नाटे और जुदाई के संग,
क्योंकि मैं जानता हूँ
हर दर्द, हर खाली पल
मुझे तेरे करीब लाता है,
रूह की उस गहराई में,
जहाँ सिर्फ हम हैं,
और सिर्फ हमारी अधूरी बातें।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,
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