लफ़्ज़ों का दरवेश
वो शब्दों का सौदागर नहीं था,
न अल्फ़ाज़ की नुमाइश लगाता था,
वो तो बस
लफ़्ज़ों का दरवेश था,
जो हर हरफ़ को
साँस की तरह बरतता था।
उसकी झोली में
शब्द नहीं, कंपन थे,
किसी रोती हुई रूह की आह,
किसी सूखी पलकों पर ठहरी दुआ,
किसी अनकहे प्रेम की हल्की-सी थरथराहट।
वो जब बोलता,
तो आवाज़ नहीं उठती थी,
बस भीतर कहीं
एक दीप जल जाता था।
जैसे कोई पुराना मंत्र
अचानक स्मृति बनकर लौट आए।
लोग उससे
कविता माँगते थे,
वो उन्हें
ख़ामोशी दे देता था।
क्योंकि उसे मालूम था,
सबसे सच्चे लफ़्ज़
उच्चारित नहीं होते,
उतरते हैं।
वो हर टूटे वाक्य को
माथे से लगाता,
हर अधूरी पंक्ति को
प्रार्थना बना देता।
उसके लिए व्याकरण नहीं,
वेदना ही नियम थी।
रात के तीसरे पहर
जब शहर सो जाता,
वो अपनी रूह के आँगन में
शब्दों को नहलाता था
आँसू से,
स्मृति से,
और उस प्रेम से
जो नाम नहीं माँगता।
कहते हैं,
जिसके भीतर
लफ़्ज़ों का दरवेश जाग जाए,
उसकी हर चुप्पी भी
एक आयत बन जाती है,
और हर आह
इबादत।
वो आज भी कहीं होगा,
किसी पन्ने के कोने में बैठा,
अधूरी स्याही से
पूरा आकाश लिखता हुआ।
मुकेश्,,,
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