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Sunday, 22 February 2026

जब वो राख की ख़ुशबू पढ़ती थी

 जब वो राख की ख़ुशबू पढ़ती थी

(एक सिगरेट की स्मृति, ध्यान की भाषा में)


वो हर उस क्षण में थी

जब मैं बुझ चुका था।

जब लपट ख़त्म हुई थी

और

बस राख थी

गर्म, मौन,

धुएँ की स्मृति से भरी।

वो मेरी राख को

सिर्फ़ देखती नहीं थी,

उसकी ख़ुशबू पढ़ती थी

जैसे कोई योगिनी

प्राचीन यज्ञ की भस्म में

पूर्वजों के मंत्र खोजती है।

मैं, जो जलकर समाप्त हो चुका था,

उसकी दृष्टि में

अभी भी ज़िंदा था

किसी अर्थ में,

किसी संकेत में,

किसी ध्यान की भाषा में।

उसने मेरे बुझने को

अंत नहीं कहा,

बल्कि

आरंभ माना

एक नयी उपस्थिति का।

वो जानती थी,

जो जल गया,

उसने स्वयं को खोया नहीं,

बदल दिया।

जब वो राख की ख़ुशबू पढ़ती थी,

मैं धुएँ से

शब्द बनता था।

मैं आग से

आशय बनता था।

मैं नश्वर होकर

अनंत में घुलता था।

और वो

उस अनंत को

साँसों में भरती थी,

जैसे किसी सूफ़ी ने

भस्म को इत्र बना दिया हो।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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