वो हर कश के बाद और पास आती गई
पहला कश उसने झिझकते हुए लिया,
जैसे कोई वर्जित कविता का पहला शेर पढ़ रही हो।
धुआँ उसके चेहरे पर लिपटा,
और मैं उसके भावों को पढ़ता गया
साँसों के बीच कोई अनकही बात
जो लफ्ज़ों में नहीं, बस ख़ामोशी में होती है।
वो咳ी, फिर मुस्कराई
"इतना बुरा भी नहीं…"
और अगला कश लिया,
जैसे मेरी आदत बन जाने की शुरुआत कर रही हो।
हर कश के साथ
वो मेरे और करीब आती गई,
जैसे धुएँ के घेरों में
उसकी दूरी घुलती जा रही हो।
उसकी आँखें गहराती गईं,
उसका चेहरा कुछ कहता रहा
बिना कुछ कहे।
सिगरेट जैसे बहाना थी
उसकी उस तलब का
जो धुएँ से ज़्यादा
मेरे वजूद को चखने की थी।/और मैं,
हर कश के साथ
उसे और गहराई से महसूस करता गया।
उसने मुस्कराकर पूछा —
"अब समझ आया तुम्हें इसमें क्या है?"
मैं हँसा
"तुम्हारा होना…
बस तुम्हारा होना।"
और सिगरेट…
बस बहाना था
एक-दूसरे में जलने का।
मुकेश ,,,,,,,,,,
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