धड़कनों की दरख़्वास्त बाक़ी है
फ़ैसले लिखे जा चुके हैं,
काग़ज़ात पर मुहरें भी लग गईं,
अक़्ल ने अपने दस्तावेज़
तह करके रख दिए,
मगर धड़कनों की दरख़्वास्त बाक़ी है।
दिल अब भी
एक कोने में खड़ा है,
हाथ में अधूरी अर्ज़ी लिए,
जिस पर न तारीख़ दर्ज है
न मुकम्मल इल्ज़ाम।
उसकी गुज़ारिश बस इतनी है,
मुझे जीने दिया जाए
मेरी अपनी रवानी में।
हर एहसास को
साबित करने की शर्त
न रखी जाए।
धड़कनें दलील नहीं देतीं,
वे सिर्फ़ मौजूद रहती हैं,
कभी तेज़,
कभी मद्धम,
कभी किसी नाम की आहट से
बेक़रार।
मैंने उन्हें समझाया
कि दुनिया में
हर चीज़ का वक़्त मुक़र्रर है,
हर जज़्बे की एक हद।
मगर वे मुस्कुरा उठीं,
जैसे कह रही हों,
मोहब्बत को
कैलेंडर में नहीं बाँधा जाता।
धड़कनों की दरख़्वास्त
दरअसल यह है
कि उन्हें
ख़ामोश न किया जाए।
कि वे जब किसी की तरफ़
हल्की सी झुकें,
तो उन्हें रोका न जाए।
क्योंकि जिस दिन
यह अर्ज़ी ख़ारिज हो गई,
उस दिन
ज़िंदगी सिर्फ़ एक आदत रह जाएगी।
मैंने फ़ाइल बंद नहीं की,
उसे खुला छोड़ दिया है।
कि शायद
किसी रात की तन्हाई में
या किसी सुबह की रौशनी में
यह दरख़्वास्त
क़ुबूल हो जाए।
तब तक
हर साँस के साथ
यह दस्तक जारी है—
धड़कनों की दरख़्वास्त
अब भी बाक़ी है।
मुक़ेश,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
No comments:
Post a Comment