“यह उस मनुष्य का रोज़नामचा है जो समय की दौड़ से थोड़ा बाहर खड़ा है और साधारण दिनों में असाधारण अर्थ खोजता है।”
रात की सीढ़ियों पर रख देता हूँ तुम्हारा नाम,
चाँद की पेशानी पर लिख देता हूँ पैग़ाम,
नींद मेरी हो न हो कोई बात नहीं,
तुम मेरी ख़्वाबों में आबाद रहना हर शाम।
मुकेश ,,,,,,,,,
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