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Monday, 30 March 2026

प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी

 प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी

शहर के बीचों-बीच

एक विशाल हॉल में

आज खुली है


“प्रेम की आख़िरी प्रदर्शनी”


दरवाज़े पर लिखा है


“अंदर आने से पहले

अपने सारे तर्क,

अपना अहं,

और अपने हिसाब-किताब

बाहर जमा कर दें।”


पर लोग

फिर भी

सब कुछ भीतर ले आते हैं


जेब में रखे हुए

शक,

दिमाग में भरे हुए

सवाल,

और दिल में

कई अधूरे सौदे।


पहली दीवार पर

टंगा है


एक पुराना आलिंगन,


जिसमें

दो लोग

दुनिया से बेख़बर

एक-दूसरे में

घर बना रहे हैं।


दूसरे फ्रेम में

एक प्रतीक्षा है


जिसने

घड़ी की सुइयों को

थाम रखा है,


और समय

उसके सामने

हार मान चुका है।


एक काँच के केस में

रखा है


एक “ना कहा गया इज़हार”,


इतना जीवित

कि

आज भी

धड़कता है।


लोग पढ़ते हैं


“यह वही प्रेम है

जो कह दिया जाता

तो शायद

हमेशा के लिए खो जाता…”


एक कोने में

एक टूटा हुआ दिल रखा है


पर अजीब बात यह है

कि

वह अब भी

धड़क रहा है।


एक बच्ची

अपनी उँगली से

उस काँच को छूती है

और पूछती है


“माँ,

क्या दर्द में भी

प्रेम होता है?”


माँ

कुछ कहना चाहती है,

पर शब्द

गले में अटक जाते हैं।


अगले कक्ष में

एक आईना है


जिस पर लिखा है


“यहाँ

वह चेहरा देखिए

जिसने कभी

सच्चा प्रेम किया था…”


लोग

खुद को देखते हैं,

और जल्दी से

नज़रें फेर लेते हैं


जैसे

उन्हें डर हो

कि कहीं

कुछ सच न दिख जाए।


भीड़ में

एक बूढ़ा आदमी

धीरे-धीरे चलता है


हर फ्रेम को

थोड़ा ज़्यादा देर तक देखता हुआ,


जैसे

वह किसी को

पहचानने की कोशिश कर रहा हो।


अचानक

वह एक तस्वीर के सामने रुकता है


जहाँ

एक लड़की मुस्कुरा रही है,


और उसकी आँखों में

पूरा आकाश बसा है।


बूढ़ा

थोड़ा काँपता है,

और फुसफुसाता है


“यह…

यह तो मेरा अधूरा प्रेम है…”


रात को

जब प्रदर्शनी बंद होती है


सारे फ्रेम

धीरे-धीरे

साँस लेने लगते हैं।


और प्रेम

किसी कोने से

धीरे से कहता है


“मैं मरा नहीं हूँ…

बस

तुमने मुझे

दिखाने की चीज़ बना दिया है…”


और बाहर

एक नया बोर्ड लग चुका है


“अगली प्रदर्शनी:

‘सच्चाई’ — देखने का साहस हो तो आइए”


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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