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Monday, 2 March 2026

लम्स की रवानी में तुम

 लम्स की रवानी में तुम


तुम्हारी उँगलियों पर ठहरी रहे

सर्द मौसम की नर्म सिहरन,

और हथेलियों में पलता रहे

एक मासूम सा इंतज़ार-ए-बोसा।


जब तुम साहिल-ए-दरिया पे बैठो,

लहरें तुम्हारी रगों में सरगोशी करें,

और बदन में उठे वो मौज-ए-लम्स

जो सिर्फ़ ख़ामोशी समझ सके।


तुम मुझे याद करो यूँ

जैसे इबादत में कोई दुआ,

मैं सामने होकर भी

तुम्हारी निगाह से ओझल रहूँ 

एक ख़ुशबू की मानिंद,

जो छूकर भी पकड़ में न आए।


तुम आब में उतरना

तो आब-सा ही बिखर जाना,

जिस तरह तुम इश्क़ में उतरती हो

बेसाख़्ता, बेआवाज़, बेख़ौफ़।


उफ़्फ़, वो इश्क़ 

जिसकी हरारत से ख़ाक भी ज़र्र-ए-ज़र हो जाए,

जिसके तसव्वुर से रूह महके,

और जिस्म सजदा-ए-शुक्र में पिघल जाए।


तुम बस यूँ ही रहना 

मेरी धड़कनों की तिलावत में,

मेरी तन्हाइयों की ताबीर में,

और उस लम्हे की रवानी में

जहाँ मोहब्बत

सिर्फ़ मोहब्बत रह जाती है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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