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Monday, 30 March 2026

एक लम्हा जो कभी गुज़रा ही नहीं

 एक लम्हा जो कभी गुज़रा ही नहीं


एक लम्हा

जो कभी गुज़रा ही नहीं,

बस ठहर गया है

वक़्त की किसी अनदेखी तह में,

जहाँ घड़ियाँ चलती तो हैं,

मगर कुछ बदलता नहीं।


वो लम्हा

शायद तुम्हारी नज़र का था,

या मेरी ख़ामोशी का,

जहाँ हमने कुछ कहा नहीं,

और सब कुछ

हमेशा के लिए कह दिया।


अजीब है

वक़्त आगे बढ़ता रहा,

दिन रात में, रात सुबह में ढलती रही,

मगर वो एक पल

आज भी वहीं खड़ा है,

जैसे उसे जाने की इजाज़त ही न मिली हो।


मैं जब भी

ख़ुद में उतरता हूँ,

वो लम्हा मुझे मिल जाता है

बिना दस्तक,

बिना आहट,

बस एक सच्चाई की तरह।


क्या वो मोहब्बत थी?

या वजूद का कोई गहरा राज़,

जहाँ “पहले” और “बाद”

अपनी अहमियत खो देते हैं,

और सिर्फ़ “होना”

बाक़ी रह जाता है।


तुम अब पास नहीं,

फिर भी वो लम्हा

मुझसे जुदा नहीं

जैसे तुम चले गए हो,

मगर तुम्हारा होना

कहीं गया ही नहीं।


और शायद

कुछ लम्हे गुज़रते नहीं,

क्योंकि वो वक़्त के नहीं होते,

वो रूह के होते हैं…

और रूह

कभी पुरानी नहीं होती।


मुकेश ,,,,,

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