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Saturday, 28 March 2026

धूप के भीतर छिपी हुई रात

 धूप के भीतर छिपी हुई रात


धूप थी

तेज़, चमकदार,

इतनी कि आँखें

अपने ही देखने पर

संदेह करने लगें।


लोग कहते थे

“सब उजला है,

यहाँ अँधेरा कहाँ?”


पर मैं देख रहा था

उस रोशनी के भीतर

एक धीमी सी परछाईं,

जो किसी की नहीं थी,

फिर भी

हर किसी के साथ चल रही थी।


धूप

सिर्फ़ बाहर नहीं पड़ती,

वह भीतर भी उतरती है


और वहीं

उसके बीच

एक रात छिपी होती है,

जो दिखाई नहीं देती,

पर महसूस होती है।


वह रात

कोई आकाश नहीं ढँकती,

कोई तारे नहीं जलाती,

वह बस

चुपचाप

मन के कोनों में बैठ जाती है।


जहाँ

हँसी के पीछे

थकान छुपी होती है,

जहाँ

सफलता के शोर में

एक खालीपन गूँजता है।


मैंने देखा

एक आदमी

धूप में खड़ा था,

उसका चेहरा चमक रहा था,


पर उसकी आँखों में

एक रात उतर रही थी

धीरे-धीरे,

जैसे कोई स्मृति

बिना बुलाए आ जाती है।


धूप

उसे छिपा नहीं सकी,

क्योंकि

धूप का काम

सिर्फ़ दिखाना है,

भरना नहीं।


और रात

वह छुपती नहीं,

बस

प्रकट होने का सही समय

चुनती है।


कभी-कभी

सबसे उजले क्षणों में

सबसे गहरा अँधेरा

जन्म लेता है।


जैसे

खुशी के चरम पर

एक हल्की सी डर की रेखा,

कि यह टिकेगा नहीं।


धूप के भीतर

छिपी हुई यह रात

हमारी असुरक्षा है,

हमारी अपूर्णता,

हमारा वह हिस्सा

जो उजाले से

पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता।


मैंने उस रात को

छूने की कोशिश की


वह ठंडी नहीं थी,

न ही डरावनी,

वह बस

ईमानदार थी।


उसने कहा

“मैं तुम्हारा विरोध नहीं,

तुम्हारा संतुलन हूँ।”


मैं चुप रहा


क्योंकि पहली बार

अँधेरा

मुझे शत्रु नहीं लगा।


धूप

अब भी थी,

पर उसका अहंकार

थोड़ा कम हो गया था।


और रात

अब छिपी नहीं थी,

वह धूप के साथ

साथ चल रही थी,


जैसे

दो विपरीत नहीं,

एक ही सत्य के

दो स्वर हों।


अब मैं समझता हूँ


धूप के भीतर छिपी हुई रात

कोई विरोधाभास नहीं,

वह जीवन का

सबसे सच्चा संतुलन है।


जहाँ

हम पूरी तरह उजले भी नहीं,

और पूरी तरह अँधेरे भी नहीं


बस

दोनों के बीच

एक निरंतर

चलती हुई चेतना हैं।


मुकेश ,,,

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