मौसी
घर में आती है
तो जैसे
हँसी का एक छोटा-सा मौसम
साथ ले आती है।
कभी
सहेली की तरह
राज़ सुनती है,
और कभी
माँ की तरह
चुपचाप
सिर सहला देती है।
उसकी डाँट में भी
थोड़ी-सी मिठास होती है,
और उसकी हँसी में
घर का अपनापन।
वो माँ भी नहीं,
पर
माँ जैसी भी है
जैसे रिश्तों की दुनिया में
प्यार ने
अपने लिए
एक और नाम
रख लिया हो
मुकेश ,,,,,,
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