तिश्नगी के किनारे तुम
कभी-कभी
समुंदर की तरफ़ देखता हूँ
तो लगता है
यह सिर्फ़ पानी नहीं है
यह किसी अधूरी दुआ का
लंबा, फैला हुआ साया है।
लहरें
जैसे किसी बेचैन दिल की धड़कन हों,
जो हर बार उठती हैं
और फिर ख़ुद ही
अपने सीने में लौट जाती हैं।
मैंने एक दिन
अपनी हथेली में
समुंदर का थोड़ा-सा पानी लिया
उसमें नमक था,
मगर अजीब बात
उस नमक में भी
किसी मीठी याद की गंध थी।
तब समझ में आया
कि तिश्नगी
सिर्फ़ प्यास नहीं होती
कभी-कभी
वह किसी रूह की तलाश भी होती है।
समुंदर शायद
किसी दरिया को नहीं,
किसी नाम को ढूँढ़ता है
कोई ऐसा नाम
जो उसके ख़ारापन को
एक पल के लिए
गीत बना दे।
और उस तलाश की
आख़िरी हद पर
जहाँ लहरें भी थककर
बस ख़ामोश हो जाती हैं,
वहीं कहीं
एक हल्की-सी रोशनी की तरह
तुम खड़ी होती हो।
जैसे
सारी दुनिया का पानी
आख़िरकार
एक ही सच पर आकर रुक जाता हो
कि हर समुंदर की गहराई में
एक तिश्नगी होती है,
और हर तिश्नगी के
सबसे आख़िरी किनारे पर
तुम होती हो
मुकेश ,
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