टेसू की आँच, रूह का रंग
टेसू के फूलों को
जब धूप ने छुआ,
उनमें एक दहकती हुई याद
धीरे-धीरे जाग उठी।
होलिका की आँच से उठती
हल्की-सी तपिश में
मैंने उन पंखुड़ियों को
पानी में डुबोया
और देखा,
रंग सिर्फ़ रंग नहीं रहा,
रूह की रवानी बन गया।
तुम पास आईं
तो हवा में केसर-सी महक थी,
तुम्हारी मुस्कान में
फागुन का बेपरवाह आसमान।
मैंने हथेली भर रंग
तुम्हारे गालों पर रखा,
जैसे कोई दुआ
माथे पर टिकाई जाती है।
उस लम्हे
टेसू की आँच
हम दोनों के दरमियाँ
इश्क़ की हरारत बनकर फैल गई
न कोई शोर,
न कोई हुड़दंग,
बस धड़कनों की मुलायम थाप।
शाम ढले
जब पानी से रंग उतरने लगे,
मैंने महसूस किया
टेसू की वह तपिश
अब भी बाकी है,
क्योंकि जो रंग रूह पर चढ़ जाए,
वह कभी फीका नहीं पड़ता।
मुकेश ,,,,,,,,
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