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Thursday, 5 March 2026

हृदय का अद्वैत

 हृदय का अद्वैत


बहुत समय तक

मैंने प्रेम को

दो के बीच घटित होने वाली घटना समझा

दो देह,

दो इच्छाएँ,

दो अलग-अलग दिशाएँ।


पर जब तुम्हारे पास आया,

तो लगा

जैसे यह गणना

कहीं से गलत है।


तुम्हारी आँखों में

मैंने अपना ही एक अंश देखा,

और अपनी धड़कनों में

तुम्हारी आहट सुनी।


तब समझ आया

प्रेम का गणित

द्वैत से नहीं चलता।


वह धीरे-धीरे

अलगाव की रेखाएँ मिटा देता है,

और दो अस्तित्वों के बीच

एक अदृश्य सेतु बना देता है।


अब मैं और तुम

दो शब्द तो हैं,

पर अर्थ एक ही है

जैसे नदी और जल।


जब तुम्हारा दुःख

मेरी आँखों में उतर आता है,

और मेरी खुशी

तुम्हारी मुस्कान में खिलती है,


तब लगता है

हृदय का अद्वैत

यहीं कहीं जन्म लेता है।


यहाँ कोई जीतता नहीं,

कोई हारता नहीं

बस

दो अलग-अलग लहरें

एक ही समुद्र में

अपना नाम भूल जाती हैं।


शायद प्रेम का अंतिम सत्य

यही है—


कि जहाँ हृदय

सचमुच खुल जाता है,

वहाँ

“मैं” और “तुम” के बीच

कोई दूरी नहीं बचती।


वहाँ बस

एक ही स्पंदन होता है

हृदय का अद्वैत।


मुकेश ,,,,,,,,

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