गालों में डिंपल वाली लड़की (दो )
वो गालों में डिंपल वाली लड़की
जब हँसती है,
तो लगता है जैसे धूप
किसी छोटे से आँगन में
घूमकर ठहर गई हो।
उसकी मुस्कान सीधी नहीं जाती,
पहले एक गोल-सा चक्कर काटती है,
फिर उस नन्हे-से गड्ढे में उतरकर
इश्क़ का घर बना लेती है।
कहते हैं डिंपल बस एक निशान है,
पर मुझे लगता है—
वह उसकी हँसी का दरवाज़ा है,
जहाँ से रौशनी
धीरे-धीरे बाहर आती है।
जब वह आँखें झुकाकर मुस्कुराती है,
तो वो छोटा-सा भंवर
दिल की सतह पर बन जाता है,
और देखने वाला
अपने ही होश भूल जाता है।
वो कोई साधारण लड़की नहीं,
वो तो एक चलती-फिरती ऋतु है
जिसके गालों में
फागुन ठहरता है,
और डिंपल में
पूरा आसमान समा जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,,,,,,
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