वजूद और वहम के दरमियान
कहीं कुछ है
और कहीं कुछ भी नहीं,
बस एक महीन-सी रेखा है
जिसे हम सच समझ लेते हैं।
मैं देखता हूँ
तो लगता है
सब कुछ मौजूद है,
मैं महसूस करता हूँ
तो शक होने लगता है।
ये जो दुनिया है—
क्या सच में बाहर है,
या मेरी ही आँखों के भीतर
किसी ख़्वाब की तरह ठहरी है?
वजूद…
शायद वो है
जिसे हम पकड़ना चाहते हैं,
और वहम
वो जो हर पकड़ से पहले
फिसल जाता है।
मैं दोनों के बीच खड़ा हूँ
न पूरी तरह यक़ीन में,
न पूरी तरह इनकार में…
बस एक एहसास बनकर,
जो हर पल खुद से पूछता है—
“मैं जो देख रहा हूँ,
वो है…
या मैं ही उसे बना रहा हूँ?”
मुकेश ,
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