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Wednesday, 11 March 2026

किताबें : ब्रह्मांड की मौन स्मृति

 किताबें : ब्रह्मांड की मौन स्मृति


शुरुआत में

शायद कोई किताब नहीं थी।


केवल

आकाश था

तारे थे

और

समय का अंतहीन सन्नाटा।


फिर

मनुष्य आया


छोटा सा

नश्वर

और भूलने वाला।


उसे डर था

कि उसके अनुभव

उसकी मृत्यु के साथ

खो न जाएँ।


तब उसने

पहली किताब लिखी।


वह

काग़ज़ पर लिखा हुआ

एक छोटा ब्रह्मांड था।


धीरे-धीरे

किताबें बढ़ती गईं।


किसी में

एक सभ्यता का इतिहास था


किसी में

एक ऋषि का चिंतन


किसी में

एक कवि का अकेलापन


और

किसी में

एक वैज्ञानिक का प्रश्न।


हर किताब

दरअसल

मानव चेतना का

एक नया ग्रह थी।


अजीब बात यह है—


किताबें

चलती नहीं

बोलती नहीं

फिर भी

मनुष्य को

हज़ारों साल की यात्रा करा देती हैं।


एक पन्ना खोलो

तो

तुम प्राचीन नगरों में पहुँच जाते हो


दूसरा पन्ना खोलो

तो

तुम किसी दार्शनिक के मन में बैठ जाते हो।


किताबें

समय को

दूरी में बदल देती हैं।


यदि किताबें न होतीं

तो मनुष्य

हर पीढ़ी में

फिर से शुरुआत करता।


हर बार

ज्ञान फिर जन्म लेता

और फिर मर जाता।


किताबों ने

ज्ञान को मृत्यु से बचा लिया।


इसलिए

किताबें

सिर्फ वस्तुएँ नहीं हैं।


वे

मानव चेतना की

दीर्घ स्मृति हैं।


जब भी

कोई किताब खुलती है


एक नया ब्रह्मांड

चुपचाप

किसी मनुष्य के भीतर

उगने लगता है।


और शायद

इसीलिए


ब्रह्मांड के सबसे शांत स्थानों में

यदि कहीं

सबसे गहरी रोशनी है


तो वह

किसी पुस्तकालय के

एक खुले हुए पन्ने में है।


मुकेश ,,,,,,,,,,,,,

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