भीतर उगती हुई रोशनी
रोशनी हमेशा
आसमान से नहीं उतरती,
कभी-कभी
वह मनुष्य के भीतर
धीरे-धीरे उगती है।
पहले
वह एक हल्की-सी आहट होती है,
जैसे किसी अँधेरे कमरे में
दूर से आती
एक पतली किरण।
फिर
वह विचारों के कोनों को छूती है,
सवालों की धूल झाड़ती है,
और मन के बंद दरवाज़ों पर
धीरे-धीरे दस्तक देती है।
लोग अक्सर
बाहर की रोशनी खोजते हैं
सफलता में,
प्रशंसा में,
या किसी और की आँखों में।
पर सच्ची रोशनी
तब जन्म लेती है
जब आदमी
अपने भीतर के अँधेरे से
भागना बंद कर देता है।
उसी अँधेरे की मिट्टी में
एक छोटी-सी समझ
बीज की तरह गिरती है,
और समय के साथ
वह रोशनी बनकर
फैलने लगती है।
तब मनुष्य जान पाता है
कि उजाला
कहीं दूर नहीं था,
वह तो हमेशा
हमारे भीतर
एक शांत सुबह की तरह
उगने का इंतज़ार कर रहा था।
मुकेश ,,,,,,
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