महकती रात में थका हुआ दिल
महकती रात थी
चमेली की खुशबू आहिस्ता-आहिस्ता
खिड़की से उतरकर
मेरे तकिये तक आ पहुँची थी।
चाँद ने जैसे
आसमान की पेशानी सहलाई,
और सितारे
दूर कहीं धीमे-धीमे बातें करते रहे।
पर इन सबके बीच
मेरा दिल —
दिन भर की थकान ओढ़े
चुप पड़ा था।
कितने चेहरों से गुज़रा था आज,
कितनी मुस्कानों में शामिल हुआ,
पर जो एक नाम भीतर था
वही पुकारना
रह गया।
रात ने पूछा
“इतनी ख़ुशबू में भी उदासी क्यों?”
मैंने हँसकर टाल दिया,
कि कुछ इंतज़ार
नींद से बड़े होते हैं।
महकती रात
अपनी बाहों में जग को सुलाती रही,
और मेरा थका हुआ दिल
बस एक सच्चे स्पर्श की कल्पना में
धीरे-धीरे धड़कता रहा।
मुकेश ,,,,,,,,
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