सुनो,
कल्पना करो
एक छोटा-सा बाग़ है,
जहाँ मौसम तुम्हारे नाम से शुरू होता है
और मेरी धड़कनों पर आकर ठहर जाता है।
हवा में
तुम्हारी हँसी की हल्की-सी खुशबू है,
जैसे किसी ने इत्र नहीं,
तुम्हें ही घोल दिया हो फिज़ा में।
हम
इक पतली-सी पगडंडी पर साथ चल रहे हैं,
बिना कुछ कहे,
जैसे लफ़्ज़ों की ज़रूरत ही न हो।
तुम अचानक रुककर कहती हो—
"सुनो… ये ख़ामोशी भी बोलती है न?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ
"हाँ… जब तुम पास होती हो।"
तुम हल्के से हँसती हो,
और वही हँसी
पूरा आसमान भर देती है।
फिर
तुम अपना सिर मेरे कंधे पर रख देती हो,
और वक़्त…
धीरे-धीरे सो जाता है।
मैं तुम्हें देखता हूँ
जैसे कोई इबादत अधूरी न रह जाए।
और तुम…
आँखें मूँदकर भी
मुझमें जागती रहती हो।
सुन रही हो न…
मेरी सुमी ?
क्योंकि
अगर तुमने जवाब न दिया
तो ये ख़ामोशी
मुझे भी अपने साथ ले जाएगी…।
मुकेश ,,,,,,,,

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