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Sunday, 8 March 2026

ख़ामोशी में छुपा हुआ ख़ुदा

 ख़ामोशी में छुपा हुआ ख़ुदा

कभी-कभी

जब दुनिया का शोर

थक कर सो जाता है,

और रात

अपने काले दामन में

सारे सवाल छुपा लेती है


तब

ख़ामोशी की गहराई में

एक हल्की-सी आहट सुनाई देती है।


वो आवाज़

न कानों से सुनाई देती है

न आँखों से दिखाई देती है,

वो तो बस

रूह की बंद खिड़कियों से

धीरे-धीरे अंदर उतरती है।


मैंने कई बार

भीड़ में उसे ढूँढना चाहा,

मगर वहाँ

सिर्फ़ चेहरों का समंदर था

और आवाज़ों का तूफ़ान।


फिर एक दिन

जब मैं अपने ही अंदर बैठा

ख़ामोश हो गया


तो लगा

जैसे दिल की वीरान मस्जिद में

कोई उजली रौशनी

सजदा कर रही हो।


तब समझ में आया

कि ख़ुदा

आसमान की ऊँचाइयों में नहीं,

ख़ामोशी की गहराइयों में छुपा है।


जहाँ शब्द

ख़त्म हो जाते हैं,

और रूह

अपने असली नाम से

पुकारे जाने लगती है।


ख़ामोशी में छुपा हुआ ख़ुदा

कभी आवाज़ नहीं देता,

वो तो बस

इंतज़ार करता है


कि इंसान

दुनिया का शोर छोड़कर

एक पल के लिए

अपने अंदर उतर आए।


मुकेश ,,,,,,,,,,

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